चलो, आज एकदम दिल पर हाथ रखकर एक बात बताओ। सुबह आँख खुलते ही सबसे पहला काम क्या करते हो? बिस्तर छोड़ने से पहले ही हाथ अपने आप तकिये के नीचे या साइड टेबल पर रखे फोन की तरफ जाता है न? और फिर शुरू होता है बिना किसी वजह के इंस्टाग्राम की रील्स को ऊपर-ऊपर सरकाना। सोचते हो कि बस दो मिनट देखूँगा, पर कब आधा घंटा बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।
यही कहानी रात को सोने से पहले की भी है। आँखें थककर बंद हो रही होती हैं, पर उँगली स्क्रीन पर लगातार चल रही होती है। यार, कभी ठंडे दिमाग से सोचना... हम फोन को चला रहे हैं या फोन हमें अपनी उँगलियों पर नचा रहा है? आज FactZone पर हम कोई बड़ा भाषण नहीं देंगे और न ही तुम्हें फोन फेंकने को कहेंगे। आज हम बस ये समझेंगे कि इस छोटी सी स्क्रीन ने कैसे हम सबको अपना कैदी बना लिया है और इससे बाहर आने का असली रास्ता क्या है। हम इस जाल में फंसे कैसे? देखो भाई, कोई भी चीज़ बिना वजह नहीं होती। ये जो सोशल मीडिया ऐप्स हैं ना, इन्हें दुनिया के सबसे शातिर दिमाग लोगों ने मिलकर बनाया है।
इनका सिर्फ एक ही मकसद है—तुम्हें जितनी देर हो सके, स्क्रीन से चिपकाकर रखना। जब भी तुम्हारी किसी फोटो पर कोई लाइक आता है या कोई नया कमेंट आता है, तो तुम्हारे दिमाग में एक केमिकल रिलीज होता है, जिसे खुशी वाला हार्मोन कहते हैं। दिमाग को इस मुफ्त के मजे की लत लग जाती है। फिर जब तुम बोर होते हो या उदास होते हो, तो दिमाग तुरंत कहता है—"चलो, थोड़ा फोन चला लो, मज़ा आएगा।
" और बस, तुम इस जाल में फंस जाते हो। इस मोबाइल स्क्रीन और इंस्टाग्राम (सोशल मीडिया) की लत से हमारा नुकसान क्या हो रहा है? बहुत से लोग सोचते हैं कि फोन चलाने से सिर्फ टाइम ही तो बर्बाद होता है, क्या फर्क पड़ता है! पर बात सिर्फ टाइम की नहीं है दोस्त, नुकसान उससे कहीं बड़ा है: फोकस की कंगाली: अब हमारा दिमाग किसी एक चीज़ पर 10 मिनट भी टिक नहीं पाता। किताब पढ़ने बैठो या कोई काम करने बैठो, हर दो मिनट में मन करता है कि ज़रा फोन का नोटिफिकेशन चेक कर लें।
अधूरी नींद का रोना:- रातभर फोन की नीली रोशनी देखने से हमारी आँखों और दिमाग को लगता है कि अभी दिन है। इससे नींद गायब हो जाती है और अगले दिन पूरा समय सुस्ती और चिड़चिड़ापन रहता है। असली रिश्ते दूर हो गए: आज एक ही घर में चार लोग बैठे होते हैं, पर कोई आपस में बात नहीं करता।
चारों अपने-अपने फोन में खोए रहते हैं। हम डिजिटल दुनिया में तो हज़ारों दोस्त बना रहे हैं, पर असल ज़िंदगी में अकेले होते जा रहे हैं। तो इस जाल से बाहर कैसे निकलें? (3 एकदम देसी तरीके)-
अब ऐसा तो है नहीं कि हम फोन चलाना बंद कर दें। आज के ज़माने में फोन के बिना काम चलना मुमकिन ही नहीं है। पर हाँ, हम इसका इस्तेमाल अपने कंट्रोल में रख सकते हैं।
इसके लिए ये 3 आसान काम करके देखो:
1. सुबह का पहला एक घंटा अपने नाम करो - एक नियम बना लो—सुबह उठने के बाद कम से कम 45 मिनट से 1 घंटा फोन को छुओगे भी नहीं। सुबह का समय तुम्हारे दिमाग के लिए सबसे कीमती होता है। उस समय उठकर थोड़ा टहलो, चाय पियो, या घर वालों से बात करो। दिन की शुरुआत कड़क होगी तो पूरा दिन बढ़िया जाएगा।
2. 'बिना फोन वाला' कोना बनाओ- अपने घर में एक जगह ऐसी तय करो जहाँ फोन ले जाना मना हो। सबसे बेस्ट है तुम्हारा बेड। सोने से आधे घंटे पहले फोन को बेड से कम से कम 5 फीट दूर किसी टेबल पर रख दो। जब फोन हाथ की पहुँच से दूर रहेगा, तो तुम बार-बार उसे उठाने के आलस से बच जाओगे और नींद भी सुकून की आएगी।
3. फालतू के नोटिफिकेशंस को अभी ऑफ करो- सच बताओ, ज़ोमैटो का "भूख लगी है तो ऑर्डर करो" या किसी शॉपिंग ऐप का "50% ऑफ" वाला नोटिफिकेशन तुम्हारे लिए कितना ज़रूरी है? कुछ भी नहीं! ये सिर्फ तुम्हें परेशान करने और ऐप खुलवाने के बहाने हैं। अपने फोन की सैटिंग्स में जाओ और व्हाट्सएप के अलावा बाकी सभी फालतू ऐप्स के नोटिफिकेशंस को हमेशा के लिए बंद (Off) कर दो।
फाइनल फैसला»आज से तुम्हें गुलाम नहीं बनना- दोस्त, फोन एक बहुत ही बढ़िया खिलौना और काम की चीज़ है, जब तक तुम उसके मालिक हो। पर जिस दिन वो तुम्हारा मालिक बन गया, तुम्हारी लाइफ का कबाड़ा होना तय है। स्क्रीन के बाहर भी एक बहुत खूबसूरत दुनिया है—दोस्तों के साथ चाय पीना, ठंडी हवा को महसूस करना, और बिना किसी कैमरे के किसी पल को जीना। तो आज ही से अपने फोन के बॉस बनो और दूसरो को भी इस ब्लॉग को शेयर करो तकी वो भी सुधर सके! क्या तुम्हें भी लगता है कि तुम फोन के जाल में फंस चुके हो? तुम्हारा रोज़ का स्क्रीन टाइम कितना रहता है?
! और इस पोस्ट को अपने उस दोस्त को ज़रूर भेज देना जो व्हाट्सएप पर हमेशा ऑनलाइन रहता है पर सामने मिलने पर बात नहीं करता। ज़िंदगी के ऐसे ही सीधे और कड़क सच जानने के लिए जुड़े रहो FactZone के साथ। स्क्रीन लॉक करो और थोड़ा मुस्कुराओ, मिलते हैं अगले ब्लॉग में



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